आध्यात्मिक पुस्तकें

सत्संग

सत्संग केवल आध्यात्मिक चर्चा नहीं, बल्कि सत्य, ज्ञान और आत्मचिंतन की ओर बढ़ने का एक पवित्र मार्ग है। प्रस्तुत पुस्तक "सत्संग" में जीवन, धर्म, भक्ति, आत्मज्ञान और मानवीय मूल्यों से संबंधित प्रेरणादायक विचारों को सरल एवं सहज भाषा में प्रस्तुत किया गया है..........

हनुमान चालीसा - विस्तृत व्याख्या

हनुमान चालीसा केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि भक्ति, ज्ञान, शक्ति और जीवन-दर्शन का अद्भुत स्रोत है। प्रस्तुत पुस्तक "हनुमान चालीसा – विस्तृत व्याख्या" में चालीसा के प्रत्येक दोहे और चौपाई का सरल, गहन तथा प्रमाणिक विश्लेषण किया गया है। प्रत्येक पद के शब्दार्थ, भावार्थ, आध्यात्मिक संदेश तथा व्यावहारिक जीवन में उसकी प्रासंगिकता को विस्तार से समझाया गया है.......

अजमेर के उवैसी सूफी संत

अजमेर सदियों से आध्यात्मिकता, प्रेम, सेवा और मानवता का केंद्र रहा है। प्रस्तुत पुस्तक "अजमेर के उवैसी सूफी संत" में उन महान सूफी संतों के जीवन, शिक्षाओं और आध्यात्मिक योगदान का परिचय दिया गया है, जिन्होंने अपने ज्ञान, करुणा और ईश्वर-प्रेम से असंख्य लोगों का मार्गदर्शन किया।........

श्री कृष्ण जयते

भगवान श्रीकृष्ण केवल एक ऐतिहासिक या पौराणिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि सनातन ज्ञान, प्रेम, धर्म और जीवन-कौशल के अद्वितीय प्रतीक हैं। प्रस्तुत पुस्तक "श्रीकृष्ण जयते" उनके दिव्य जीवन, प्रेरणादायी चरित्र तथा कालजयी शिक्षाओं का सरल एवं सारगर्भित परिचय प्रस्तुत करती है.........

सूफी फकीर - हज़रत रामदत्त मिश्रा 'उवैसी'

हज़रत रामदत्त जी साकार सूफी वेद जैसे रहे हैं। जो सूफीयत का ज्ञान करा दे वह सूफी वेद। जो सूफी फकीरी का बोध करा दे वह सूफी वेद। जो सूफी साधना की बुलंदी तक पहुंचा दे वह सूफी वेद। रामदत्त जी ऐसे ही थे। उनमें सूफीयत साकार थी। उनमें गुरु भक्ति, प्रेम और सेवा भाव लबालब भरा हुआ था – जैसे एक ही बदली में पूरा सावन रिमझिम करता रहे। हमने इसीलिए उन्हें सूफी वेद जैसा फकीर कहा है।

रूहानी पुरुष - हज़रत हरप्रसाद मिश्रा 'उवैसी'

काॅलेज की पढाई के वक्त पढ़ा था कि संत-महात्मा व फकीर कैसे होते हैं। पढ़-लिख कर प्रोफेसर हो गया। तब इनके बारे में पढ़ाने लगा। फिर हज़रत हरप्रसाद मिश्रा 'उवैसी' के सम्पर्क में आया। साक्षात देखा कि सूफी फकीर ऐसे होते हैं। दिखने में मेरे आपके जैसे होते हैं। खाते-पीते हैं। सोते-जागते हैं। नहाते-धोते हैं। सारी क्रियाएं मनुष्य की तरह करते हैं। लेकिन यारी खुदा से करते हैं..........

एक श्लोक की गीता

ग्यारहवें अध्याय के 55 वें श्लोक की व्याख्या। अर्जुन को कृष्ण ने अपना विश्व रूप एवं चतुर्भुज रूप दिखा दिया। तब वह बोला कि मैं अब स्थिर हो गया हूं। तब कृष्ण ने उसे कहा कि जो मनुष्य कर्तापन के अभिमान व भोक्ता भाव की आसक्ति से मुक्त रह कर केवल मेरे निमित्त कर्म करता है वही कर्मण्य है। जो ब्रह्म के बोध को ही स्वयं की परम गति मानता है वही ज्ञानी है........

संत श्री सेवाराम

अवतार का सत्य

गीता में चौथे अध्याय के 7-8 वें श्लोक की व्याख्या। अवतार जन्म नहीं लेता, उसका सृजन होता है। कृष्ण कहते हैं कि तदात्मानं सृजाम्यहम्। देवकीनंदन से योगेश्वर श्रीकृष्ण तक उनके व्यक्तित्व का उत्थान हुआ था। यही मानव जीवन की पूर्णता है। पूर्णता ही परम है, ईश्वर है। यह मनुष्य की आत्मिक शक्तियों की अभिव्यक्ति है...........

श्री कृष्ण से मुलाकात

18 वें अध्याय के 65 वें श्लोक की व्याख्या। ईश्वर बाहर कहीं नहीं मिलेगा। वह मनुष्य के अंदर ही है। कृष्ण ने गीता में पाँच बार कहा है कि मैं प्रत्येक प्राणी के हृदय में आत्मा के रूप में निवास करता हूं। ईश्वर यानी परम चेतना की अनुभूति के तीन उपाय हैं – भक्ति, ज्ञान एवं कर्म............

श्री रामचरित

गीता में जीवन की पूर्णता

गीता पाप मोचनी

अठारहवें अध्याय के 66 वें श्लोक की व्याख्या। साथ में सृष्टि के प्रथम वैष्णव मंत्र – गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि का आलोचन। गीता के उक्त श्लोक में कृष्ण डंके की चोट पर कहते हैं कि तुम मेरी शरण में आ जाओ; मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूंगा। इसमें समझाया गया है – पाप का अर्थ, शरण का मतलब, कृष्ण का आश्वासन, पाप से मुक्ति का तात्पर्य एवं कृष्ण ने गीता में कितनी बार ऐसा कहा है। किसी भी अवतार ने यों प्रत्यक्ष घोषण नहीं की है.............

गीता 150 प्रश्नोत्तर

इस किताब में निष्काम कर्म, ज्ञान, भक्ति, परमात्मा, आत्मा, प्रकृति आदि से संबंधित वे सारी बातें समझाई गई हैं जो गीतोपदेश में हैं। ऐसे ही जीवात्मा, मोक्ष, बंधन, पुनर्जन्म, वैकुण्ठ, ब्रह्म, परब्रह्म आदि विषयक सत्य को बोधगम्य ढंग से स्पष्ट किया गया है। इसका भी खुलासा किया गया है कि कृष्ण ने गीतोपदेश केवल अर्जुन को ही क्यों दिया? त्रिगुणात्मक प्रकृति से परे निकल जाने का क्या अर्थ है, इसका भी प्रतिपादन किया गया है...............

दशानन चरित

अनार्य संस्कृति के महानायक लंकेश या रावण अथवा दशानन पर यह एक सकारात्मक पुस्तक है। इसमें राम–रावण युद्ध को दो विपरीत सुस्कृतियों का महासंग्राम बताया गया है। साथ ही रावण के पांडित्य, शौर्य, चरित्र, सोच, औदात्य आदि का तर्कसम्मत विश्लेषण है। सीता, मंदोदरि, रावण आदि से संबद्ध लोक कथाओं का अधिकतम संग्रह भी उपलब्ध है..............

सूफी संत और उनकी कथाएँ

यह बहुत चर्चित किताब है। इसमें हमने सूफी साधना पद्धति को सैद्धांतिक एवं मौलिक ढंग से प्रतिपादित किया है। सूफी आश्रम में दस वर्ष रह कर सूफीयत को समझा, फिर लिखा। साथ में विश्व के प्रमुख 27 सूफी संतों के जीवन एवं शिक्षाओं को शब्दांकित किया गया है। विशेष बात यह है कि पहली बार उवैसिया सूफी शाखा के भारतीय बुजुर्गों का एक साथ विवरण यहां उपलब्ध है। कुछ प्रमुख संत – ख्वाजा साहब, सरमद, राबिया बसरी, निजामुद्दीन औलिया, अमीर खुसरो, जोगिया दरवेश, शाह लतीफ, सिंधी संत चेनराई सामी आदि...............

नारी मुक्ति

यह किताब गीता के दसवें अध्याय के 33 वें श्लोक के आधार पर लिखी गई है। उक्त श्लोक में कृष्ण कहते हैं कि स्त्री में उनकी सात विभूतियां हैं – कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा। इन सातों की सोदाहरण व्याख्या इस पुस्तक की विशेषता है। इसमें अदिति, अरुंधति, शची, अनसूइया, सूर्या सावित्री, सती मदालसा, ऋषिका वाचक्नवी गार्गी, कालीदास की पत्नी विद्योत्तमा, रत्नावली आदि प्रसिद्ध महिलाओं की कीर्ति का वर्णन है। इसमें स्त्री की आंतरिक मुक्ति का पथ प्रशस्त किया गया है...........

कर्मण्येवाधिकारस्ते

गीता के दूसरे अध्याय के 47 वें श्लोक की विस्तृत विवेचना। इसमें कर्म, अकर्म, विकर्म, निष्काम कर्म में अंतर बताते हुए व्याख्या की गई है। स्वकर्म, स्वधर्म, स्वभाव का भी विश्लेषण किया गया है। बताया गया है कि निष्कामता मन की एक अवस्था मात्र है। इस अवस्था में ठहर जाने के बाद ही अनासक्ति का भाव आता है। कर्म संबंधी जितने भी प्रश्न हो सकते हैं उन सबके जवाब यहां उपलब्ध हैं। यह सामान्य मनुष्य के वश की बात नहीं है। हम जब स्वयं के व्यक्तिगत अहं बोध को भूल जाते हैं तब ही गीता का कर्मवाद समझ में आता है................

मोक्ष का सत्य

सारी दुनियां के धार्मिक ग्रंथों में मोक्ष की अवधारणा है। तो क्या है यह मोक्ष? इसी सवाल का जवाब प्रस्तुत पुस्तक में तलाश किया गया है। पृष्ठभूमि के रूप में आत्मा, परमात्मा, प्रलय, खण्ड व आत्यंतिक प्रलय आदि को समझाया गया है। जीवात्मा क्या है, देह में कैसे आती है, आत्मा जीव भाव से किस तरह मुक्त हो सकती है? इनकी भी विवेचना है.................

सद्गुरु शरणम

यह पूर्ण रूपेण आध्यात्मिक किताब है। इसमें बताया गया है – लेखक के गुरु कौन थे? उनसे दीक्षा कैसे हुई? शक्तिपात कैसे हुआ? शक्तिपात के बाद क्या हुआ? किस तरह अंदर रूहानी परिवर्तन घटित होते हैं? समाधि लगना, अंधेरे में दिखाई देना, महात्मा के शरीर के आर-पार दिख जाना, अंदर के चिदाकाश में ब्रह्माण्ड दिखाई देना आदि................

अजमेर इतिहास और पर्यटन

यह शहर ब्रिटिश काल में राजस्थान की शैक्षिक राजधानी रहा है। इसकी प्राचीनता द्वापर युग तक देखी गई है। इसे समेटते हुए अजमेर की प्रेम कथाएं पहली बार लिखी गई हैं। ऐसे ही इस शहर की विख्यात हवेलियों का रोचक इतिहास भी सर्वप्रथम सामने लाया गया है। यहां के पर्यटन स्थलों में प्रमुख हैं – वातानुकूलित सीसा खान, पहला पहाड़ी दुर्ग तारागढ़, चिश्तिया दरगाह, जैनियों का सुंदरतम मंदिर ‘सोनीजी की नसियां’, एक हजार साल पुरानी आनासागर झील, ढाई दिन का झौंपड़ा या सरस्वती मंदिर आदि..............

पुष्कर अध्यात्म और इतिहास

तीर्थराज पुष्कर पर एक आधिकारिक किताब। इस पौराणिक कस्बे की भौगोलिक स्थिति एवं ऐतिहासिकता पर शोधपरक सामग्री प्रभावशाली है। कुछ चौंकाने वाली बातें हैं – असली पुष्कर कहां? क्या फूलों की घाटी के पास? ऐसे ही सरस्वती नदी अजमेर के निकट वाले पुष्कर में कभी नहीं बही। गायत्री मंत्र की रचना पुष्कर में हुई थी? पुष्कर में औषध वनस्पतियों की प्रचुरता.............

Hamare Pujya Gurudev