लेखक परिचय

श्री शिव शर्मा

नाम - शिव शर्मा (पूरा नाम शिव नारायण शर्मा)

जन्म – 27 जून 1949, अजमेर।

शिक्षा : हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, राजकीय महाविद्यालय, अजमेर। अजमेर की लोक कथाओं पर शोध कार्य।

कार्य क्षेत्र - पत्रकारिता, लेखन, कालेज स्तर पर अध्यापन।

पत्रकारिता

दैनिक न्याय (साहित्य सम्पादन), आधुनिक राजस्थान (साहित्य सम्पादन एवं स्तम्भ लेखन - विचार गंगा, सिलसिला, संपादकीय एवं आस-पास बिखरा इतिहास), इतवारी पत्रिका (अटीक सटीक व्यंग्यात्मक स्तम्भ एवं फीचर्स), राजस्थान पत्रिका (ख्वाजा के द्वार पर, फर्श से अर्श तक और अजमेर की बेजार बस्तियाँ स्तम्भ लेखन) , दैनिक भास्कर (लेख एवं फीचर्स), अमर उजाला (सामयिक लेख), जागरण (सामयिक लेख), नयी दुनियाँ, मझधार में व्यंग्य स्तम्भ, राष्ट्रदूत (सामयिक एवं ऐतिहासिक लेख), नवभारत टाइम्स आदि।

पत्रकारिता के लिए जिला पत्रकार संघ अजमेर द्वारा पुरस्कृत।

लेखन कार्य

विविध पत्रिकाओं में लेखन – नन्दन, नन्हें तारे, दिनमान, नवनीत, मायापुरी, वामा, मधुमति आदि।

कालेज स्तर पर पुस्तक लेखन - भारतीय दर्शन, रामचन्द्रिका, आंगन के पार द्वार, राम की शक्ति पूजा, बाण भट्ट की आत्म कथा, कनुप्रिया आदि पुस्तकों पर समीक्षात्मक लेखन। साथ ही राजस्थान सामान्य ज्ञान, ऊषा हिंदी निबंध एवं रस प्रक्रिया पुस्तकों का लेखन।

अन्य लेखन - आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, पर्यटन, गीता, हनुमान चालीसा एवं विविध विषयों पर 25 से अधिक (निम्नलिखित) किताबें ।

शोध कार्य

अजमेर की लोककथाएं, अजमेर का इतिहास (दैनिक आधनिक राजस्थान मे धारावाहिक प्रकाशन), अजमेर के जैन मंदिर एवं वैष्णव मंदिर (राजस्थान पत्रिका में), पुष्कर का इतिहास एवं मंदिर (पुष्कर अध्यात्म एवं इतिहास पुस्तक में)।

सोशल मीडिया प्लेटफार्म (facebook) पर एक हजार से अधिक ब्लॉग लेखन – कर्म, धर्म, दार्शन, आत्मा, साधना, मंत्र विज्ञान आदि-आदि विषयों पर आलेख। साथ ही विभिन्न ब्लॉग पेज जैसे परावाणी, रूहानी संवाद, परा शब्द आदि पर गीत, ग़ज़ल एवं सचेतन स्त्री पर लगभग 25 लघु कहानियों का लेखन (updated)।

अध्यापन

श्रमजीवी कॉलेज अजमेर, रीज़नल कालेज अजमेर, जैन तेरापंथ कॉलेज राणावास, गवर्नमेंट कॉलेज झालावाड़, आबूरोड, नासीराबाद एवं देवली।

गुरु से दीक्षा

सन 2004 में सूफी संत हज़रत हरप्रसाद मिश्रा (उवैसिया रूहानी सत्संग आश्रम, अजमेर) से दीक्षा और सूफी चेतना मे अंतर्यात्रा। श्वास साधना। मंत्र साधना। गुरू द्वारा किये गये शक्तिपात के सहारे अंतर्लोकों के दर्शन। ध्यान की गहराई एवं विस्तार की अनुभूतियाँ। तमसो मा ज्योतिर्गमय की संकल्पना में निरंतर आंतरिक गति शीलता।

अब - 'मै कौन हूं' की अनुभूति कराने वाले 'मौन' के पथ पर अग्रसर।