गुरुदेव

गुरुदेव हज़रत हरप्रसाद मिश्रा 'उवैसी'

सरकारी कॉलेज में हिंदी साहित्य पढ़ाते हुए मैं सन 2000 के दौरान अजमेर के सूफी संत (उवैसिया सिलसिला) हज़रत हरप्रसाद मिश्रा उवैसी की शरण में पहुंचा। आप बाबा बादाम शाह साहब के मुरीद थे। बाबा बादाम शाह साहब की दरगाह अजमेर के सोमलपुर गाँव में है। वस्तुतः उवैसी सूफी सिलसिले के समर्थक उवैस करणी साहब रहे हैं।नाम - शिव शर्मा (पूरा नाम शिव नारायण शर्मा)इस सिलसिले की पाँच दरगाह भारत के रामपुर शहर में हैं। दो दरगाह झाँसी में हैं। दो दरगाह ही अजमेर मे हैं। हमारे गुरुदेव मैथिली ब्राह्मण थे। रेल्वे में काम करते थे। बाबा बादाम शाह साहब ने इन्हें दीक्षा दी। शक्तिपात किया। आगे बढ़ाया। अंततः परदा फरमाने से पहले आपने मिश्रा जी को ही अपनी गद्दी दे दी।

गुरुदेव रूहानी हस्ती की बुलंदी थे। सूक्ष्म शरीर से कहीं भी चले जाना उनके लिए एकदम सहज काम था। दूसरों के मन की बात पढ़ लेना, किसी को भी, कहीं पर भी बैठे हुए देख लेना, अपनी जगह बैठे-बैठे ही दूसरों के कष्ट दूर कर देना आदि। मैंने यह सब स्वयं अपनी आँखों से देखा है। वे प्रतिदिन संध्या के बाद सूक्ष्म शरीर से अपने प्रत्येक मुरीद के घर जाते थे और उसकी हरकतों को देखते थे। बाद में चेतावनी देते थे कि भजन किया करो। उन्होंने मंत्र शक्ति से असंभव समझे जाने वाले कार्य भी किए थे। उनकी संकल्प शक्ति के विस्तार की कोई सीमा नहीं थी। उन्होंने अपनी गद्दी अपने पुत्र हज़रत रामदत्त जी मिश्रा को दे दी थी। अपने गुरु बाबा बादाम शाह साहब कि नयनाभिराम दरगाह उन्होने ही बनवाई थी। हज़रत मिश्रा जी कि दरगाह तबीजी गाँव डूमाड़ा रोड पर स्थित है। इसका निर्माण हज़रत रामदत्त जी मिश्रा ने करवाया था।

हम किताबों में सूफी संतों के बारे में जो कुछ भी पढ़ते हैं, हज़रत मिश्रा जी उससे भी बहुत आगे और ऊंची अवस्था में थे। केवल नज़र से देख कर शक्तिपात कर देते थे। संकल्प शक्ति से ही दूसरों के कष्ट दूर कर देते थे। उनका एक ही सर्वोपरि कथन था कि ब्रह्म मुहूर्त में जागो, दीक्षा मंत्र का सुमिरन करो और उसे सिद्ध कर लो। यही गुरु दक्षिणा है।

मुझे गुरुदेव कि शरण में ले जाने के निमित्त थे पत्रकार अरविंद गर्ग। दीक्षा हुई। शक्तिपात हुआ। कुण्डलिनी ऊर्जा ऊपर ऊठी। भीतर ज्योति जागी। नाम गूंजने लगा। जो सूक्ष्म था वह दिखने लगा। मूलाधार से कपाल तक ज्योति दिखने लगी। गुरू का सूक्ष्म रूप साथ-साथ चलने लगा। तब सोच बदली। विचार बदले। मान्यताएं बदलीं। ज्ञान अंदर उतरने लगा। गुरूदेव ने किताबें लिखवाना शुरू किया। एक के बाद एक पच्चीस किताबें लिखवा दीं।

आंतरिक यात्रा शुरू हुई। सूक्ष्म शरीर दिखता रहा। मन में विचार और दृश्य प्रत्यक्ष होने लगे। गुरूदेव ने दीक्षा मंत्र को सिद्ध कराया। मेरा अस्तित्व ही उनके नियंत्रण में था। मनोसंवाद होने लगा। मन में ही सवाल-जवाब होने लगे। पूर्वाभास होने लगा। दरगाह एवं आस्ताने का रूहानी वजूद नज़र आने लगा। फिर बाहर का सब कुछ भीतर आ गया। नाद सुना। रूहानी स्वाद चखा।देव दर्शन हुए। दरगाह में ही ओम् सुना, हरे राम कृष्ण का कीर्तन सुना, नमोकार मंत्र भीतर उतरा। हनुमान चालीसा का ज्ञान हुआ। सूफी बुजुर्गों के अंतर्दर्शन हुए। ब्रह्मांड का विस्तार भी दिखा।

इस तरह गुरू कृपा ने सब कुछ बदल दिया।